बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

विचार-विमर्श

एक रोज़
दही से मथ दिए सारे विचार
अम्मा ने
कहे कि यही विमर्श है !
साध लो...!!

आँगन में गढ़ी सिल और गहरा गई
आजन्म लोढ़े सी अम्मा पीसती है...
तीखे मसाले और विचार
बहुत हुआ... मझली का !
कमबख्त बी ए की किताबें
क्या क्या सिखा गईं बहुओं को..

बड़की ने तो काट लिए थे
पूरे बारह बरस....
आँगन में खाटों पर सूखते सूखते
पापड़ और बड़ी के साथ
सो तो न कौंधे विचार....!
छुटकी भी गाय की घण्टी सी
बजती है मंद मंद
लच्छन की मारी है..!!

और ये मझली....हाय!!
कोहराम मचा है इसका
कि कुछ ज़्यादा ही करती है तर्क
मनाही पर भी विचारती है
और बेपर्दा संवादों से
विमर्श साधती है ।


करुणा सक्सेना

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

बसन्त ऋतु

गीतिका छन्द

ऐ बसन्ती पात पीले, हाथ पीले मैं चली,
बिछ गई रौनक सजीली, है छबीली हर कली ।

आम पर नव बौर आई, ठौर पाई रीत की,
रात कोयल गुनगुनाई, राग डोली प्रीत की ।

आ गए राजा बसन्ती, क्या छटा रस रूप की
मैं निराली संग हो ली, चिर सुहागिन भूप की ।

नाम मेरा सरस सरसों, बरस बीते मैं खिली,
देख निज राजा बसन्ती, पुलकती फूली फली ।

अब हवा में छैल भरती, गैल भरती नेह की,
ज्यों बढ़ाती धूप नन्दा, नव सुगन्धा देह की ।

रात भर चलती बयारें, टोह मारे बाज सी,
प्राण सेतू बह्म सींचें, आँख मींचे लाज सी ।

देस धानी प्रीत घोले, मीत बोले नैन में,
तन गुजरियाँ राह चलतीं, ढार मटकी चैन में ।

त्योंरियाँ छैला गुलाबी, यों चढ़ाता मान से,
धार से काँकर बजाता, मोह लेता गान से ।

करुणा सक्सेना

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

मनहरण

मन में उठा विराग
छल है ये जीव-राग
खोजने चली तो तेरे
द्वार तक जाऊँगी ।।

मुझको उबार दे या
मुझको डुबाले तू ही
तैरने चली तो तेरे
पार तक जाऊँगी ।।

मन तू करे हरण
प्रेम मैं करूँ वरण
समझी नही तो छन्द
सार तक जाऊँगी ।।

छोड़ साँसों का व्यापार
छेड़ दे तू ब्रह्म-तार
तेरी जीत को कन्हाई
हार तक जाऊंगी ।।




करुणा सक्सेना